दम लगा के हईशा: …ताकि मधुर बना रहे जिंदगी का संगीत
शादीशुदा जिंदगी पुराने ऑडियो कैसेट की तरह होती है, जिसके दो साइड होते हैं. साइड ‘ए’ और ‘बी’. दोनों तरफ अलग-अलग मूड के गाने होते हैं. इन गानों को एक टेप के जरिये कैसेट में पिरोया जाता है. दोनों साइड के बीच इतना सामंजस्य होता है कि जब एक साइड के गाने बजते हैं तो दूसरे साइड के गाने हस्तक्षेप नहीं करते. पति-पत्नी में भी इसी तरह का मेल होना जरूरी है, ताकि जिंदगी का संगीत हमेशा मधुर बना रहे. ‘10 एमएल लव’ फिल्म के बाद शरत कटारिया ने अपनी फिल्म ‘दम लगा के हईशा’ में यही समझाने की कोशिश की है.
आयुष्मान खुराना और नवोदित भूमि पेडनेकर अभिनीत यह फिल्म आम भारतीय समाज में होने वाली शादियों के बाद एक-दूसरे से अनजान पति-पत्नी के जीवन में आए बदलाव और नोक-झोंक की टोह लेती है. हमारे यहां शादी तय करते समय लेन-देन, शादी का खान-पान, स्वागत सत्कार का सबसे ज्यादा और सबसे पहले ख्याल रखा जाता है. लड़का-लड़की एक-दूसरे को झेल पाएंगे या नहीं, इस पर दोनों पक्षों में कम ही बात की जाती है. तर्क ये दिया जाता है कि दोनों साथ रहते-रहते एक-दूसरे को जान-समझ लेंगे. दिक्कत तब होती है, जब पति कम पढ़ा-लिखा और पत्नी बीएड कर चुकी हो. कभी उनमें नोक-झोंक हुई तो कहा जाता है कि घर में रखे बर्तनों में टकराहट होती रहती है. ऐसी शादियों में पति-पत्नी की आपसी समझ और सम्मान ही उनकी जिंदगी में खुशी बनाए रखती है.
‘दम लगा के हईशा’ हमें 90 के दशक की सैर कराती है. जब युवा कुमार सानू के गानों को 24 घंटे रेडियो, वॉकमैन और टेप रिकॉर्डर से सुना करते थे. मोबाइल-इंटरनेट चलन से बाहर थे. युवाओं के दिलों की धड़कन जूही चावला और माधुरी दीक्षित हुआ करती थीं. दुल्हन के रूप में युवा इन्हीं की कामना किया करते थे. इन परिस्थितियों में मन-मुताबिक दुल्हन न मिले तो एक संघ की ‘शाखा’ के सदस्य पति का विद्रोह लाजमी नजर आता है.
फिल्म उन लोगों, गीत-संगीत, परिस्थितियों और साजो-सामान की बात करती है, जो अब अतीत का हिस्सा हो चुके हैं. फिल्म में थोड़ी देर के लिए गायक कुमार सानू नजर आएं हैं. फिल्म में कुमार सानू ने दो और साधना सरगम ने एक गाने में अपनी आवाज का जादू बिखेरा है. इन दोनों को हमने कब का भुला दिया है. गैंग्स ऑफ वासेपुर के गीतों के जरिए धमाल मचाने के बाद गीतकार वरुण ग्रोवर ने इस फिल्म के लिए कमाल के गीत रचे हैं. मोनाली ठाकुर का गाया ‘मोह-मोह के धागे’ थियेटर से निकलने के बाद भी कानों में गूंजता रहता है. ‘दर्द करारा’ गीत से सानू की आवाज पर अनु मलिक का संगीत कानों में मिश्री घोल देता है.
आयुष्मान खुराना ने इस फिल्म से साबित किया है कि वह एक अच्छा गायक होने के साथ ही एक परिपक्व अभिनेता भी हैं. हालांकि फिल्म में उन्होंने कोई गाना नहीं गाया है. भूमि पेडनेकर अपने किरदार के रूप में इतनी विशुद्ध नजर आई हैं कि लगता ही नहीं कि यह उनकी पहली फिल्म है. भूमि ने उन मान्यताओं को भी तोड़ा है, जिसमें अभिनेत्री का जीरो साइज होना जरूरी माना जाता है. संजय मिश्रा कमाल के हैं. इस फिल्म में भी वे अच्छा अभिनय करने की अपनी आदत से बाज नहीं आते.
यह पहली बार है जब कोई फिल्म पूरी तरह से मंदिरों के जुड़वां शहर हरिद्वार-ऋषिकेश में फिल्माई गई है. प्रोडक्शन डिजाइनर के साथ कॉस्ट्यूम डिजाइनर दर्शन जालान उस दौर के फैशन को जीवंत करने में सफल रहे हैं. इन सबके बीच पहलाज निहलानी के नेतृत्व वाले सेंसर बोर्ड को इस फिल्म के कुछ शब्दों पर आपत्ति थी. जैसे ‘लेस्बियन’ शब्द को म्यूट कर दिया गया है और चार दूसरे शब्दों में बदलाव किए गए हैं. बहरहाल ‘दम लगा के हईशा’ के रूप में दर्शकों को एक ऐसी फिल्म मिली है, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा.
दम लगा के हईशा
निर्देशकः शरत कटारिया
लेखकः शरत कटारिया
कलाकारः आयुष्मान खुराना, भूमि पेडनेकर, संजय मिश्रा, अल्का अमीन, शीबा चड्ढा, सीमा पहवा
स्टारः 4.5
आयुष्मान खुराना और नवोदित भूमि पेडनेकर अभिनीत यह फिल्म आम भारतीय समाज में होने वाली शादियों के बाद एक-दूसरे से अनजान पति-पत्नी के जीवन में आए बदलाव और नोक-झोंक की टोह लेती है. हमारे यहां शादी तय करते समय लेन-देन, शादी का खान-पान, स्वागत सत्कार का सबसे ज्यादा और सबसे पहले ख्याल रखा जाता है. लड़का-लड़की एक-दूसरे को झेल पाएंगे या नहीं, इस पर दोनों पक्षों में कम ही बात की जाती है. तर्क ये दिया जाता है कि दोनों साथ रहते-रहते एक-दूसरे को जान-समझ लेंगे. दिक्कत तब होती है, जब पति कम पढ़ा-लिखा और पत्नी बीएड कर चुकी हो. कभी उनमें नोक-झोंक हुई तो कहा जाता है कि घर में रखे बर्तनों में टकराहट होती रहती है. ऐसी शादियों में पति-पत्नी की आपसी समझ और सम्मान ही उनकी जिंदगी में खुशी बनाए रखती है.
‘दम लगा के हईशा’ हमें 90 के दशक की सैर कराती है. जब युवा कुमार सानू के गानों को 24 घंटे रेडियो, वॉकमैन और टेप रिकॉर्डर से सुना करते थे. मोबाइल-इंटरनेट चलन से बाहर थे. युवाओं के दिलों की धड़कन जूही चावला और माधुरी दीक्षित हुआ करती थीं. दुल्हन के रूप में युवा इन्हीं की कामना किया करते थे. इन परिस्थितियों में मन-मुताबिक दुल्हन न मिले तो एक संघ की ‘शाखा’ के सदस्य पति का विद्रोह लाजमी नजर आता है.
फिल्म उन लोगों, गीत-संगीत, परिस्थितियों और साजो-सामान की बात करती है, जो अब अतीत का हिस्सा हो चुके हैं. फिल्म में थोड़ी देर के लिए गायक कुमार सानू नजर आएं हैं. फिल्म में कुमार सानू ने दो और साधना सरगम ने एक गाने में अपनी आवाज का जादू बिखेरा है. इन दोनों को हमने कब का भुला दिया है. गैंग्स ऑफ वासेपुर के गीतों के जरिए धमाल मचाने के बाद गीतकार वरुण ग्रोवर ने इस फिल्म के लिए कमाल के गीत रचे हैं. मोनाली ठाकुर का गाया ‘मोह-मोह के धागे’ थियेटर से निकलने के बाद भी कानों में गूंजता रहता है. ‘दर्द करारा’ गीत से सानू की आवाज पर अनु मलिक का संगीत कानों में मिश्री घोल देता है.
आयुष्मान खुराना ने इस फिल्म से साबित किया है कि वह एक अच्छा गायक होने के साथ ही एक परिपक्व अभिनेता भी हैं. हालांकि फिल्म में उन्होंने कोई गाना नहीं गाया है. भूमि पेडनेकर अपने किरदार के रूप में इतनी विशुद्ध नजर आई हैं कि लगता ही नहीं कि यह उनकी पहली फिल्म है. भूमि ने उन मान्यताओं को भी तोड़ा है, जिसमें अभिनेत्री का जीरो साइज होना जरूरी माना जाता है. संजय मिश्रा कमाल के हैं. इस फिल्म में भी वे अच्छा अभिनय करने की अपनी आदत से बाज नहीं आते.
यह पहली बार है जब कोई फिल्म पूरी तरह से मंदिरों के जुड़वां शहर हरिद्वार-ऋषिकेश में फिल्माई गई है. प्रोडक्शन डिजाइनर के साथ कॉस्ट्यूम डिजाइनर दर्शन जालान उस दौर के फैशन को जीवंत करने में सफल रहे हैं. इन सबके बीच पहलाज निहलानी के नेतृत्व वाले सेंसर बोर्ड को इस फिल्म के कुछ शब्दों पर आपत्ति थी. जैसे ‘लेस्बियन’ शब्द को म्यूट कर दिया गया है और चार दूसरे शब्दों में बदलाव किए गए हैं. बहरहाल ‘दम लगा के हईशा’ के रूप में दर्शकों को एक ऐसी फिल्म मिली है, जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा.
दम लगा के हईशा
निर्देशकः शरत कटारिया
लेखकः शरत कटारिया
कलाकारः आयुष्मान खुराना, भूमि पेडनेकर, संजय मिश्रा, अल्का अमीन, शीबा चड्ढा, सीमा पहवा
स्टारः 4.5







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