...जब दिल बना पतंग
आज दोपहर छत पर दिल पतंग बना शान से आसमान में उड़ा जा रहा था। काफी दिनों बाद (शायद पांच-सात साल गुजर गए होंगे) संक्रांति पर पतंग और मांझा चकरी (मेरी तरफ इसे लटाई बोलते हैं) के साथ हाथ लगे थे। पेंच लड़ाई और सूरज से आंखें भी मिलाई।
बचपन एक बार फिर पतंग और उसकी डोर पर धमा-चौकड़ी मचाता नज़र आ रहा था। माहौल इस लिहाज़ से अलग था, क्योंकि फादर फोबिया साथ न था। वरना छत की दुछत्ती पर चढ़ते ही 'गिर जइबे, चोट लग जाई, साला दिनभर छत पर चढ़ा रहता है' जैसी डपटपूर्ण आवाजें कानों में घुसपैठ करने लगती थीं।
खैर बचपन का ये खेल दोपहर में जब जीवंत हुआ तो मजा आ गया। साथी पतंगबाज़ दृगचंद ने इस मौज में भरपूर साथ दिया। उम्मीद है मेरे अजीज साथियों ने भी मौज किया होगा। ऐसे ही मौज करते रहें और तैयार रहिए, क्योंकि बसंत आने को है...
15/01/15

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें