'डॉन ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स': लालच और विनाश की कहानी


लालच का रास्ता विनाश की ओर ले जाता है। हर किसी में यह किसी न किसी रूप में पाया जाता है। किसी की पैसे का लालच है तो किसी को सत्ता का, किसी को अपने वरिष्ठों को खुश करने का लालच है तो किसी को कड़वाहट दूर कर गांधी बनने का। हॉलीवुड के निर्देशक मैट रीव्स ने जुलाई 2014 में रिलीज हुई अपनी फिल्म 'डॉन ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स' (वानरों के ग्रह का उदय) के जरिये यही समझाने की कोशिश की है।


यह फिल्म 2011 में आई 'राइज ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स' फिल्म का दूसरा भाग है। दूसरे भाग में एक ऐसी दुनिया दिखाई गई है, जहां मानवों को नामोनिशान धरती लगभग मिट गया है और वानरों का जगह-जगह कब्जा है। अमेरिका का सैन फ्रांसिस्को शहर पूरी तरह से उजड़ चुका है। ये एक ऐसी दुनिया है जहां वानर मानवों की तरह बोलते हैं, शिकार और घुड़सवारी करते हैं। साथ ही हथियार चलाना भी सीख लेते हैं।


मानव अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे छिपकर रहते हैं। दुनिया भर से उनका संपर्क कट चुका है। मानव सभी तरह की सुख-सुविधाओं से महरूम हो चुका है। इसी दौरान वानरों और मानवों के बीच एक छोटा सा संघर्ष दोनों को फिर आमने-सामने ला देती है।


वानरों का मुखिया सीजर इंसानों से समझौता चाहता है, मगर उसके साथी वानर कोबा की चाहत कुछ और ही होती है। यह चाहत या कहें तो लालच वानरों और मानवों के बीच भयानक संघर्ष का कारण बनती है। एक ऐसा युद्ध शुरू हो जाता है, जिसमें वानरों का अंत निश्चित है। रीव्स शायद फिल्म की अगली कड़ी में हमें इस युद्ध से परिचित कराएं।


फिल्म का दूसरा भाग हर लिहाज से अपनी पूर्वज फिल्म से कमतर है।  शायद यह निर्देशक बदल जाने का असर रहा हो। बहरहाल इस फिल्म का हीरो सीजर है, जिसकी भूमिका में एंडी सरकिस ने बेहतरीन काम किया है। फिल्म लंबी और युद्ध आधारित होने की वजह से थोड़ा-बहुत ऊब भी पैदा करती है। अंधेरे में फिल्माए जाने से तमाम दृश्य समझ में ही नहीं आते। पहले भाग में इंसानों के धीरे-धीरे खत्म होने की कहानी बहुत ही बेहतरीन तरीके से बुनी गई वहीं इसमें इसकी कमी झलकती है। 

राइज ऑफ द प्लैनेट ऑफ द एप्स (2011)


फिल्म पहले भाग में अल्झाइमर रोग से मानव को बचाने के लिए एक फार्मा कंपनी 'एल्ज 112' नाम की दवा बनाती है। दवा का चिंपाजिंयों पर बेहतर असर देखते हुए इसे और पावरफुल बनाते हुए 'एल्ज 113' दवा का निर्माण किया जाता है।


इस दवा के साथ दिक्कत यह होती है कि चिंपाजिंयों पर तो इसका बेहतरीन असर होता है। उनका दिमाग विकसित और तेजी से काम करने लगता है। उनमें समझ विकसित हो जाती है। वहीं मानवों पर यह वायरस की तरह असर करती है, जिसके प्रभाव में आकर कुछ ही दिन में उनकी मौत हो जाती है। इसी के प्रभाव से इंसान लगभग खत्म हो जाते हैं। 


वानरों और मानवों के बीच संघर्ष हॉलीवुड में काफी पुरानी और पसंदीदा विषय है। इस विषय पर तमाम फिल्में बनाई गई हैं। ये फिल्में दो या तीन भागों में बनी और फिर उनका रिमेक किया गया। ऐसी फिल्में बनाने की शुरुआत 1968 में 'प्लैनेट ऑफ द एप्स' फिल्म से हुई।  

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