चप्पल-जूते@चंदेरी
बड़े भाई प्रशांत दुबे की वजह से हाल ही में चंदेरी जाने का मौका हाथ लग गया। आना मुश्किल नजर आ रहा था, मगर कुछ दोस्तों ने आने की हामी भरी तो अपन भी तैयार होकर निकल पड़े। ये चप्पल-जूते वहीं पड़े नजर आए। चंदेरी के गर्म माहौल में ये जूते-चप्पल काफी दिलचस्प लगे, क्योंकि ये काफी कुछ सिखा रहे थे। इनमें सबसे पीछे सीना ताने जो स्वेट लेदर जूता नजर आ रहा है वो दरअसल मेरा ही है।
विकास संवाद की ओर से 'आदिवासी और मीडिया' पर तीन दिनी कार्यशाला ने कई सारे दोस्तों और बड़े भाइयों से मिला दिया। कार्यशाला का पहला दिन तो साधारण विचार-विमर्श में गुजर गया। ऐसा शायद सबके थका-हारा होने की वजह से भी हुआ। दूसरे दिन का माहौल गर्मी का साथ थोड़ा गर्म रहा। ये गर्माहट विचारों में भी महसूस किया गया। एक वक्ता की बातों पर स्रोता वर्ग दो गुटों में बंट गया और माहौल गर्म हो गया। उस वक्ता को तमाम सारे लोगों ने तुरंत आड़े हाथों लिया।
हम फेसबुक और टि्वटर की दुनिया में जी रहे हैं। जिन्होंने हमें खुद को अभिव्यक्त करने के कहीं बड़े और व्यापक मौके दिए हैं। ऐसी स्थिति में हर किसी को अपनी बात कहने का हक है। अगर वो बात आपको ठीक लगती है तब तो ठीक है, लेकिन अगर नहीं लगती तो भी आपको धैर्य से अपनी बात रखनी चाहिए।
खैर जब माहौल गर्म हुआ तो मेरा ध्यान कार्यक्रम में शामिल हुए लोगों के चप्पल-जूतों पर गया। चंदरी की भीषण गर्मी और कार्यशाला के गर्म माहौल में भी ये पूरी तरह से सौम्य बने हुए थे। सभी बड़ी विनम्रता से जहां -तहां पड़े हुए थे।
ध्यान आया कि ये जूते-चप्पल हमें काफी कुछ सिखा सकते हैं। हम लोगों के लिए यह एक तरह की सीख हो सकती है कि किसी भी माहौल और परिस्थिति में हमें आपा नहीं खोना चाहिए। सभी को सुने, फिर अपनी कहें। बात खत्म करने से पहले ये प्रशांत भइया का धन्यवाद कहना चाहूंगा, जिन्होंने हमें यहां कार्यक्रम में आमंत्रित किया। माफी चाहूंगा कि बिना बताए निकल आया।
पंकज भइया का धन्यवाद कि वो बरेली से चंदेरी तक आए। इसके अलावा ये सारे जूते-चप्पल सुमित पांडेय के सर पर मारना चाहूंगा, क्योंकि वह हां करके भी चंदेरी नहीं आया। साथ ही ये बताना चाहूंगा कि ये फोटो मैंने नहीं मेरे एलजी एल 90 मोबाइल फोन ने खींची है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें