साठ रुपये के किलो टमाटर, वह भी कच्चे

जन-गण मन के देवता, अब तो आंखें खोल
महंगाई से हो गया, जीवन डांवाडोल
जीवन डांवाडोल, खबर लो शीघ्र कृपालु
कलाकंद के भाव बिक रहे, बैंगन-आलू
कह 'काका' कवि, दूध को बच्चे तरसे
साठ रुपये के किलो टमाटर, वह भी कच्चे
राशन की दुकान पर, देखकर भयंकर भीर
'क्यू' में धक्का मारकर पहुंच गए बालवीर
पहुंच गए बालवी, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गए निर्बल, बूढ़े, बच्चे और महिला
कह 'काका' कवि, बंद कर धरम का कांटा
लाला बोले- भागो खत्म हो गया आटा

                                        ...काका हाथरसी

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