‪ऑरकुट नॉस्टैलजिया‬: भाग एक


शिक्षक दिवस पर यह हमारी ओर से आयोजित किया गया एक बड़ा कार्यक्रम था। बड़ा इसलिए क्योंकि माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में इससे पहले स्टूडेंट लेवल पर कोई ऐसा कार्यक्रम नहीं हुआ था, जिसमें सभी डिपार्टमेंट के बच्चों ने भाग लिया हो। और शायद हमारे बाद भी कभी ऐसा नहीं हुआ। इस आयोजन में दो प्रमुख नेतृत्वकर्ता रहे, वे हैं परम पूजनीय, आदरणीय नेता जी (धीरज राय) और अंकुर विजयवर्गीय। इन्हीं 'महापुरुषों' की छत्रछाया में कार्यक्रम की नींव पड़ी। यह तस्वीर उसी कार्यक्रम की है। साल शायद 2008 था। नेताजी माइक संभाले हुए हैं, मैं उनकी ओर मुंह किए उनकी बातों को ध्यान से सुन रहा हूं। बाएं से तीसरे मित्र सुमित भी निर्विकार भाव से नेताजी की वाणी को आत्मसात कर रहे हैं। बाकी कुछ दूसरे साथी हैं।

कार्यक्रम के लिए हमने यानी प्रशांत वर्मा, दीपक गौतम आवारा, सुमित पांडेय, सुजीत, प्रवीण पांडेय, शांतनु मिश्रा उर्फ बुढ़ऊ, इसके अलावा मास कम्यूनिकेशन, एडवरटाइजिंग एंड पब्लिक रिलेशन और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हमारे दूसरे साथियों ने एक हफ्ते तक काफी मेहनत की थी, तब कहीं जाकर इस कार्यक्रम का शानदार आगाज हुआ और यह बेहतरीन तरीके से अपने अंजाम तक पहुंचा। माइक संभालने का जिम्मा नेताजी के मजबूत कंधों पर रहा और उसना साथ शिल्पा ने बखूबी दिया था। 

30 सिंतबर को ऑरकुट बंद हो जाएगा। यह फोटो वहीं से उड़ाई है। यह वह दौर था जब फेसबुक का रंग फीका था। रंग अब भी फीका है, लेकिन अब हमें यही भाता है। ऑरकुट के फोटो को मैं 'ऑरकुट नॉस्टैलजिया' शीर्षक से आगे भी पेश करूंगा। यह पहला भाग है। मैं भुल्लकड़ बड़ा हूं, इसलिए इस आयोजन से संबंधित दूसरी यादों को जरूर साझा करें। मैं जानता हूं आयोजन से जुड़े तमाम सारे नाम छूट गए हैं उसके लिए मुझे माफ करिएगा।
(नोट: यार, अंकुर बुरा मत मानना नेताजी का नाम तुमसे पहले लिखना जरूरी था। मैं नेताजी को नाराज नहीं कर सकता। वैसे ये ध्यान रखना मैंने तुम्हें कभी कैलाश विजयवर्गीय से कम नहीं समझा।)

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