अलहदा इलाहाबाद


इलाहाबाद में मैंने तकरीबन पौने तीन साल गुजारे हैं। अजीब कशिश है इस शहर की और अगर नौकरी बहाना नहीं बनती तो शायद ही कभी इलाहाबाद जाता या जाने की सोचता। वैसे ये भारत के महत्वपूर्ण शहरों में से एक है। महाकुंभ इसे और विशेष दर्जा दिलाता है, मगर फिर भी मैं शायद ही कभी इस शहर पहुंचता।

इलाहाबाद का अंदाज दूसरे शहरों की तुलना में अलहदा है। इस अलहदेपन को मैंने बहुत नजदीक से महसूस किया है। बाकी दूसरे शहर तो अजीब शहरीपने से ग्रस्त हैं, जो मन को बांध नहीं पाते। वहीं इलाहाबाद शायद एकमात्र ऐसा शहर है जो शहर होने के साथ अपने गंवई अंदाज को अपने अंदर सदियों से जज्ब किए हुए हैं।

यहां न मेरा घर था और न ही कोई रिश्तेदार, फिर भी सारा शहर अपना लगता था। चुंबक की तरह दिल और मन को अपनी ओर खींचता था। इसी चुंबक ने मुझे और मेर मस्तीखोर मित्र शिवम को कई सालों तक बांधे रखा। रात-रात भर घूमना या फिर फिल्में देखना, सुबह सोना। क्या दिन थे। गंगा किनारे भटकना। हंसी बटोरना और फिर उसे बिखेराना।


आप इस शहर में ठेठ गांव की महक महसूस कर सकते हैं और इसका शहरीपना भी देख सकते हैं। इन दोनों का एक साथ किसी शहर में पाया जाना मुझे लगता है नामुमकिन हैं, क्योंकि शहरीपना शायद एक लाइलाज बीमारी जैसे है, जो शहरों से उनकी मासूसियम छीनकर उन्हें घोर यांत्रिक बनाते जा रहे हैं।

इसका नतीजा ये है कि सभी शहर एक जैसे लगने लगे हैं। लखनऊ, कानपुर, दिल्ली, गाजियाबाद, इंदौर, भोपाल, बरेली, उज्जैन सब के सब तो एक जैसे हैं। हर शहर में वहीं मॉल और उनमें संजे-संवरे शोरूम हर जगह देखने को मिल जाएंगे, लेकिन इलाहाबाद, इलाहाबाद है। शुद्ध देसी के साथ-साथ अक्खड़ शहरी।

इलाहाबाद में संगम पहुंचिए तो वहां गंगा, जमुना और अदृश्य सरस्वती के किनारे खड़ा किला कई सदियों की दास्तां कहते-सुनते नजर आते हैं। फक्कड़पना ऐसा कि रात-रातभर सिविल लाइंस और कटरा में चाय पीते गुजर जाती थी। गजब दिन थे। हर समय मस्तीखोरी। बीते मंगलवार को ये तस्वीरें एएफपी पर नजर आईं तो उन मस्तीखोर दिनों की यादें फिर ताजा हो गईं और इन्हें साझा करने से खुद को रोक नहीं सका।

इलाहाबाद... मिसिंग यू यार...
  

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