सिटीलाइट्स: सपनों की मखमली दुनिया की क्रूर हकीकत


हर आदमी का सपना होता है- अच्छी कमाई और सुंदर घर, ताकि वह परिवार को खुश रख सके। तमाम लोग यही सपना लेकर शहर आते हैं। शहरों में जो नए घर बन रहे हैं वो दरअसल घर नहीं सपना होते हैं। कुछ सपने बड़े होते हैं और कुछ छोटे।


महेश भट्ट के बैनर से हाल ही में आई फिल्म 'सिटीलाइट्स' इसी की बानगी है, जिसे 'शाहिद' फेम निर्देशक हंसल मेहता ने फिल्माया है। फिल्म की कहानी राजस्थान के पाली जिले के एक छोटे से गांव से शुरू होती है। इस गांव में दीपक सिंह (राजकुमार राव) कपड़े की दुकान चलाता है। घर में उसके अलावा पत्नी (पत्रलेखा) और एक प्यारी बेटी रहते हैं। दीपक की दुकान नहीं चलती है। दुकान के लिए वह कर्जदार हो जाता है। दुकान छूट जाती है।


इस मुश्किल वक्त में बेहतर जीवन और अच्छी कमाई के लिए वह गांव छोड़कर सपनों की नगरी मुंबई का रुख करता है, क्योंकि उसने सुन रखा होता है कि वहां कोई भूखा नहीं सोता है, लेकिन यहां उसका सामना शहर की क्रूर सच्चाई से होता है।


क्योंकि यहां जीवन और कठिन होता है। खासकर तब जब आप यहां किसी भरोसेमंद को नहीं जानते और आपके पास रहने के लिए छत नहीं हो। दीपक को विष्णु (मानव कौल) की मदद से सिक्योरिटी एजेंसी में नौकरी और किराये का घर तो मिल जाते हैं, लेकिन इसी के साथ वह इस शहरी दलदल में ऐसा फंसता है, जहां से निकलना मुश्किल होता है।


राजकुमार राव एक मंझे हुए कलाकार हैं। हर किरदार को वह इतना विश्वसनीय बना देते हैं दर्शक राजकुमार को भूलकर सिर्फ किरदार को याद रखते है। इस फिल्म से हंसल मेहता ने फिल्म 'शाहिद' का जादू दोहराया है। विष्णु के रोल को मानव कौल ने बहुत ही सधे तरीके से जिया है।


यह फिल्म 2013 में आई फिलीपींस की 'मेट्रो मनीला' फिल्म की आधिकारिक रीमेक है। हालांकि ये कारोबारी रूप से सफल नहीं रही, लेकिन हमारे जैसे लोग जो घर हजारों किमी. दूर शहरों में पड़े हैं, उनके लिए ये मस्ट वॉच मूवी है।  

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