'मैं इंदौर हूं'
करोड़ों बरस पुरानी धरती पर
चंदन का महकता पेड़ हूं मैं,
मैं तिलिस्म हूं...
जो देखते-देखते
गांव से बन गया महानगर,
एक सपना जो उतर आया जमीं पर।
झरना हूं जिसने पहाड़ों को काटकर
लिखा अपना मुकद्दर
एक जज्बा हूं जो न खंजर के काटे कटा,
न तोप के उड़ाए उड़ा।
एक भोर जिसे शाम का पता मालूम नहीं,
आसमान हूं जिसने
चांद-तारों को दी है पनाह,
कुएं का मीठा पानी हूं
जिस पर हक है हर प्यासे हलक का,
वो कौर हूं जिससे हारती है भूख।
लोकमाता अहिल्या की बुनी चदरिया हूं
जिसे ओढ़ता-बिछाता है हर इंसान,
मैं एक घर हूं,
शहर हूं,
परिंदों का घोसला हूं,
हारे हुओं का हौसला हूं...
मैं इंद्रेश्वर हूं...
इंद्रपुर हूं...
इंदूर हूं...
जी हां, मैं इंदौर हूं...।
इंदौर के जाल सभागार में बीते शनिवार (07 जून) को बड़े भाई, सहकर्मी, रंगकर्मी ओम द्विवेदी ने खुद के रचे एकल नाटक 'मैं इंदौर हूं' का भावपूर्ण मंचन किया।

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