अच्छी सस्पेंस थ्रिलर हो सकती थी 'एक विलेन'
फिल्म 'एक विलेन' एक अच्छी सस्पेंस थ्रिलर मूवी हो सकती थी, मगर हो न सकी। आखिर तक ये समझ नहीं आता कि निर्देशक मोहित सूरी फिल्म में दिखाना क्या चाहते हैं। क्या वे एक गुंडे का प्यार में पड़कर अच्छा इंसान बनना दिखाना चाह रहे थे।
या फिर ये कि एक लड़की किसी बीमारी की शिकार होकर मरने वाली है और अपनी बची जिंदगी दूसरों की खुशी के लिए जीती है। (बीमारी के बारे में मत पूछिएगा क्योंकि फिल्म में इसका खुलासा ही नहीं किया गया है।) या फिर ये कि एक टेलीफोन मैकेनिक है, जो बीवी की डांट खाता है और अपना गुस्सा दूसरों की बीवियों की हत्या कर निकालता है।
कहानी का यही पहलू फिल्म में रुचि जगाता है। इसलिए मोहित को इसी पहलू पर सबसे ज्यादा फोकस करना चाहिए था। कई चीजों को समेटने के चक्कर में फिल्म की कहानी बिखर गई है। कभी फिल्म सस्पेंस लगती है तो कभी ड्रामेटिक हो जाती है और कभी लगता है नहीं यार ये तो लव स्टोरी है।
बहरहाल फिल्म के शीर्ष किरदार सिद्धार्थ मल्होत्रा को ग्रे शेड के रोल निभाने के लिए अभी बहुत मेहनत करने की जरूरत है। वह गुरु नाम के गुंडे के रोल में जंचते नहीं हैं। चॉकलेटी छवि में तो वे ठीक हैं। उनकी पिछली फिल्म 'हंसी तो फंसी' में उनका अभिनय विश्वसनीय लगाता है, मगर इस फिल्म में नहीं।
फिल्म में जो कुछ भी है वह रितेश देशमुख ही हैं। इस फिल्म में सीरियल किलर का किरदार निभाकर कॉमेडियन की अपनी छवि को तोड़ने की उनकी कोशिश सराहनीय हैं। उनके अभिनय में वैराइटी है। श्रद्धा कपूर का अभिनय भी औसत रहा है। उनका चुलबुला किरदार अच्छा है।
मोहित सूरी ने फिल्म में बहुत सारे फर्जी कलाकार (गैंगस्टर के रोल में पॉप गायक रेमो फर्नांडीज, रितेश के दोस्त के रूप में कमाल आर. खान और इंस्पेक्टर के रोल में शाद रंधवा) भर रखे हैं, वह ऐसे किरदारों से आसानी से बच सकते थे।






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