बिना कारण मर जाएं तो जिंदगी का क्या फायदा: मंजूनाथ
आईआईएम लखनऊ से एमबीए करने वाले अमर मंजूनाथ षणमुगम यही कहा करते थे बिना कारण के मर जाएं तो जिंदगी का क्या फायदा। यही उनका उद्देश्य भी था। उन्होंने जिंदगी में सिर्फ ईमानदारी से अपना काम किया और यही उनका गुनाह बन गया।
इसकी सजा उन्हें अपनी अपनी जान देके गंवानी पड़ी। 27 साल का यह नौजवान इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन में नौकरी पाने के बाद उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में पोस्टेड हुआ। यहां मंजू ने तेल में मिलावट के खिलाफ पेट्रोल पंप मालिकों के खिलाफ मोर्चा खोला और नतीजा ये हुआ कि 2005 छह गोलियां उनके सीने में उतार दी गईं।
संदीप ए. वर्मा निर्देशित फिल्म 'मंजूनाथ: ईडियट था साला' 9 मई को सिनेमाघरों में रिलीज हुई। दुर्भाग्य ये रहा कि यह पर्याप्त दर्शक नहीं बटोर सकी। आज इंदौर के सत्यम सिनेप्लेक्स में भी मुझे मिलाकर इस फिल्म को सिर्फ पांच से छह दर्शक ही नसीब हो सके।
फिल्म में मंजूनाथ बने सशो सतीश सारथी ने अन्याय के खिलाफ लड़ने की उनकी मनोदशा को बखूबी पेश किया। यह उनकी पहली फिल्म है। यशपाल शर्मा, सीमा विश्वास और दिव्या दत्ता ने सारथी का बेहतरीन साथ दिया है।
हम सबसे युवा देश की डुग्गी लेकर जब-तब बजाते रहते हैं। हमारे देश में 'टू स्टेट्स' और 'रागिनी एमएमएस' जैसी फिल्में तो हिट हो जाती हैं, मगर 'मंजूनाथ: ईडियट था साला' जैसी सार्थक फिल्में दर्शकों को भी तरसती हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि हम युवा देश होने के लिए गर्व करें या कुछ और...
खबर ये भी है कि इस फिल्म को बनाने के लिए निर्देशक संदीप ए. वर्मा को अपनी संपत्ति भी गिरवी रखनी पड़ी। पता नहीं ये फिल्म उन्हें अपना उधार चुकाने में मदद कर सकेगी या नहीं। बहरहाल संदीप को एक सार्थक फिल्म से रूबरू कराने के धन्यवाद।






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