भूतनाथ और पत्रकारों की व्यथा कथा


लोकतंत्र का उत्सव लगातार जारी है। नौ चरण में से पांच चरणों के मतदान हो चुके हैं और सब पर चुनावी रंग चढ़ा हुआ। हमारे नेता एक-दूसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त हैं। चुनाव के बहाने इन्हें अमर्यादित होने और कुछ भी बकबक करने का जैसे विशेषाधिकार मिल गया। लिहाजा धर्म के नाम पर हर दल किसी न किसी खास वर्ग का खास बनने की कोशिश कर रहा है।

खैर ये राजनीतिक तमाशा है जिसे हम पिछले कई दशकों से देख रहे हैं और उम्मीद है ये आगे भी ऐसे ही बदस्तूर देखते रहेंगे। इतनी बकवास मैं एक जानकारी देने के लिए कर रहा हूं। दरअसल 'भूतनाथ' लौट आया है यानी 'भूतनाथ रिटर्न' रिलीज हो चुकी है। पता है थोड़ा लेट हूं, लेकिन इसका भी अपना मजा है।


आमतौर पर बॉलीवुड में फिल्मों के दूसरे भाग से हमें निराशा ही मिलती है, मगर 'भूतनाथ रिटर्न' औरों से अलग है। यह फिल्म एक शानदार राजनीतिक व्यंग्य है। अब भारत में भ्रष्टाचार तो शाश्वत सत्य है और हमारे नेता इसके अलावा भला और कर भी क्या सकते हैं! इसी से तंग आकर भूतनाथ यानी कि अपने महानायक अमिताभ बच्चन चुनाव लड़ने की ठान लेते हैं।

दरअसल इस फिल्म के पहले हिस्से के पूरा होने के बाद वह 'भूतवर्ल्ड' जाते हैं तो वहां के सारे भूत उनका मजाक बनाते हैं कि वे एक बच्चे को भी नहीं डरा पाए और भूतों का नाम मिट्टी में मिला दिया। इससे नाराज होकर भूतनाथ फिर से धरती पर आता है, जहां उसकी मुलाकात एक 10-12 साल के लड़के अखरोट (पार्थ भालेराव) से होती है।


उसके मोहल्ले के दुख और इलाके के नेता भाऊ (बोमन ईरानी) के भ्रष्टाचार को देखते हुए वह चुनाव मैदान में उतर पड़ते हैं। एक वकील के माध्यम से वह चुनाव लड़ने की सभी योग्यताओं को पूरा करते हैं और हां, एक खास बात उनका चुनाव लड़ना भ्रष्टाचार के चलते ही संभव हो पाता है। इसके बाद बोमन ईरानी और अमिताभ के शानदार और देश की व्यवस्था पर चोट करती हुई नोक-झोंक के साथ फिल्म आगे बढ़ती हैं। ये फिल्म शानदान होने के साथ खूब मजेदार भी है।


मूंगफलियों से मतदान का महत्व
फिल्म का एक हिस्सा मुझे बेहतरीन लगा। जिसमें भूतनाथ 10 मूंगफलियों के जरिये मतदान का महत्व समझाता है। अखरोट को वह बताता है कि हमारे देश में तकरीबन आधे लोग वोट नहीं करते हैं। मतलब पांच मूंगफलियां बेकार हो जाती हैं। अब बाकी की पांच मूंगफलियों में से तीन जिसके हाथ लग जाती हैं वो जीत जाता है, मतलब कम मतदान के चलते प्रत्याशियों का जीतना आसान हो जाता है।

इसलिए भूतनाथ लोगों में वोट डालने के लिए जागरूकता फैलाता है। चुनाव के वक्त आई यह फिल्म बेहतरीन है और हमें हमारे कर्तव्यों की याद दिलाती है कि वोट करना महत्वपूर्ण हैं। भूतनाथ के हिसाब से अच्छे लोग इसी कारण हार जाते हैं या चुनाव नहीं लड़ते क्योंकि हमारे यहां मतदान प्रतिशत आबादी का आधा ही रहता है। इसलिए अब भी वक्त हैं जाइए और मतदान करिए।


अब असलियत बताता हूं। भूतनाथ फिल्म के जरिए मैंने आपको इतना ज्ञान तो दे दिया कि वोट जरूर डालिए लेकिन मैं खुद वोट करने नहीं जा पाऊंगा, क्योंकि भइया चुनाव है और हमारे अखबार को हमारी जरूरत है। तमाम पत्रकार साथियों को तो वीकली ऑफ तक नसीब नहीं हो रहे हैं साहब, क्योंकि उन्हें अखबार छापना है। और एक बात अखबार वाले मतदान के लिए इतनी जागरूकता फैलाते हैं और कभी किसी पत्रकार को आगे बढ़कर छुट्टी नहीं देते कि जाओं बेटा तुम भी डाल आओ वोट। खैर हमारा हाल तो आदिकाल से ऐसा ही है, मगर आप जरूर वोट करें। और अगर नई सरकार से कुछ उम्मीद बंधती है तो  पार्टी तो बनती है बॉस... याद से दे दीजिएगा...।

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