तुम्हारे लिए...


मैं पंकज भइया की कलम के कमाल से तो वाकिफ था, लेकिन वह रंगों से भी कमाल करते हैं उसका पता इस कवर फोटो से चला, जिसे मैंने उनकी कवर फोटो से उड़ा लिया है। सुमित और मैं जब से उनसे मिले हैं, (अगस्त 2009, बरेली) तब से ही वह हमारी प्रेरणा के स्रोत हैं।

बरेली पहुंचने के साथ ही आशीष भइया और पंकज भइया का घर हमारा हो गया था। यही दो घर हमारे ठौर-ठिकाने हुआ करते थे। दिन का ज्यादातर समय यहीं गुजरता था। कितना समय गुजर गया, लेकिन यादों की खुशबू आज भी जेहन में ताजा बनी हुई है। कितना मन करता है कि बरेली चलें, मगर ऐसा हो नहीं पाता

विज्ञान और तकनीक के मामले में हमने कितनी तरक्की कर ली है, मगर आज भी हम अपने मन की तकनीक से मीलों पीछे चल रहे हैं। काश कोई ऐसी तकनीक होती कि मन के पहुंचने के साथ हम भी वहां पहुंच जाते। 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

असली मस्तराम की तलाश

हैप्पी फीट: मछली की तरह तैरने वाला पक्षी पेंग्विन