जहां रंग पंचमी पर जवां होती है होली


कई सालों बाद इस बार होली पर घर से दूर रहा, शायद यह जानने-समझने के लिए कि इंदौर में होली कैसे होती है। इंदौर में होली की रंगत कुछ फीकी रहती है। इसका ये मतलब नहीं कि खेली ही नहीं जाती। होली के दिन भी इसे जमकर खेला जाता है, मगर यहां होली के पांचवे दिन यह जवां होती है, जिसे रंग पंचमी के नाम से जाना जाता है।


इस बार इंदौर में होने की वजह से दो दिन होली खेलने का मौका मेरे हाथ लग गया। और घर रहूं या बाहर मजा लेने में मैं कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता। यानी होली और और रंग पंचमी खूब झमाझम तरीके से जमकर खेली।


फिलहाल इनमें से एक भी फोटो होली की नहीं है, क्योंकि एक मित्र ने होली की सारी फोटो डंप कर ली है। फोटो डंप करना उनकी आदत में शुमार है। इसलिए होली के शुभ अवसर पर अपडेट के लिए मुझे रंग पंचमी की तस्वीरों से काम चलाना पड़ रहा है। तो ये बता देता हूं कि पहली बार होली इंदौर में खेली और पहली बार रंगपंचमी पर होली खेली और पहली बार नहा-धोकर शैम्पू-वैम्पू करने के बाद होली खेली।


दरअसल रंग पंचमी खेलने का कोई अंदाजा नहीं था। इंदौर के सुखलिया (जहां हमने बहुत दुख लिया है) मोहल्ले में खाना-वाना खाकर ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था कि ऑफिस के ही साथी मनीष, अभिषेक, विक्रांत, सिद्धार्थ कमरे पर आ रंग डालने। रंग पड़ी तो हम तिगाड़े यानी प्रशांत, राजीव और डीसी भी मस्त हो गए। उसके बाद मलंगों की टोली अनिल पांडेय सर को काला-पीला करने उनके यहां पहुंच गया। फिर चाय-नाश्ता और नहा-धोकर मजदूरी पर निकल गए।
शुभ होली...।

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