नंदा: एक था गुल और एक थी बुलबुल


एक था गुल और एक थी बुलबुल, दोनों चमन में रहते थे,
फिर एक दिन की बात सुनाऊं, एक सय्याद चमन में आया
ले गया वो बुलबुल को पकड़ के, और दीवाना गुल मुरझाया
शायर लोग बयां करते हैं, ऐसे उन की जुदाई की बातें
गाते थे ये गीत वो दोनों, सैय्या बिना नहीं कटती रातें
मस्त बहारों का मौसम था, आंख से आंसू बहते थे
एक था गुल और एक थी बुलबुल, दोनों चमन में रहते थे।

(08 जनवरी 1939-25 मार्च 2014) # RIP 

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