ओ पाप्पे 'शादी के साइड इफेक्ट्स' देख कर पछताया


लगता है बॉलीवुड को भारतीय विवाह प्रथा की जानकारी नहीं है और अगर है भी तो बहुत ही सतही है। तभी शायद वे 'शादी के साइड इफेक्ट्स' और 'शुद्ध देसी रोमांस' जैसी फिल्में बनाते हैं, जिनका हकीकत से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्हें लगता है कि कोई अगर शादी कर लेता है तो रोमांस गायब हो जाता है और झगड़े शुरू हो जाते हैं। अगर ऐसा होता तो शायद भारत में परिवारवाद जन्म ही नहीं लेता।

ऐसे ही 'शुद्ध देसी रोमांस' में बताया जाता है कि भारतीय युवा जिम्मेदारी उठाने से डरता है इसलिए शादी के मंडप से भाग जाता है। मगर माफ कीजिए ऐसा कुछ नहीं अगर वह जिम्मेदारी नहीं उठाना चाहता तो शादी का मंडप सजने तक की नौबत ही नहीं आने देता।

हर रिश्ते में लड़ाई-झगड़े होते हैं मगर उसे सिर्फ पति-पत्नी के झगड़े से महिमामंडित करना ठीक नहीं। फिल्में समाज का आईना होती हैं तो इसे समाज से जोड़कर ही रखा जाए तो बेहतर होगा।

'प्यार के साइड इफेक्ट्स' में राहुल बोस बने सिद्धार्थ और त्रिशा बनीं मल्लिका शेरावत के बीच की केमिस्ट्री और कहानी कहने का तरीका 'शादी के साइड इफेक्ट्स' में नदारद है। फिल्म का फर्स्ट हाफ तो बांधे रखतो हैं मगर सेकेंड हाफ में नींद आने लगती है।

इस फिल्म के गाने भी बहुत प्रभावी नहीं हैं। वहीं 'प्यार के साइड इफेक्ट्स' में 'ओ पाप्पे प्यार करके पछताया', 'जाने क्या चाहे मन बावरा' और 'दिल तोड़ के ना जा मुंह मोड़ के ना जा' जैसे गाने आज भी जेहन में ताजा हैं। इसलिए इसे देखना आपकी जेब पर कुछ ज्यादा ही इफेक्टिव हो सकता है।

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