केपी सक्सेना: अब कौन सुनाएगा मियां लादेन के किस्से

1. इस सुहानी सुबह में तुम्हें 'जीकेटी' पिलाता हूं। नहीं समझे? जिंजर (अदरक), काली मिर्च, तुलसी वाली। इससे जाड़ों में नाक से गले तक का पैसेज एकदम विधानसभा मार्ग जैसा साफ रहता है।



2. वाकई मियां, ऐसी गलन की हड्डियों में टुंड्रा का म्यूजिक बज रहा है। अख़बारों ने छापा है कि पहाड़ों पर बर्फ गिरती है। हवाएं मैंदान में सर्दी और नमी लाती हैं। नमी से कोहरा बनता है। नहीं समझे? ठीक वैसे ही, जैसे ऊंचे स्तर पर एक परम बेईमान नेता करोड़ों-अरबों का भ्रष्टाचार करता है। इससे महंगाई बढ़ती है   कीमतें आसमान छूती हैं  मरा गैस सिलेंडर तक 932 पर मूंछें ऐंठता है। आम आदमी ठंड से हाय-हाय करता है और महंगाई से सरकार पर थू-थू।



ऊपर लिखी लाइनें मेरी लिखी नहीं है। इन्हें लिखा है मशहूर कहानीकार, पटकथा लेखक और व्यंग्यकार केपी सक्सेना ने। मन्ना डे, राजेंद्र तिवारी के बाद 'लगान', 'स्वदेश', 'जोधा अकबर' और 'हलचल' जैसी फिल्मों के डायलॉग लिखने वाले कालिका प्रसाद सक्सेना ने गुरुवार को हमारा साथ हमेशा के लिए छोड़ दिया। पिछले एक साल से वह जीभ के कैंसर से पीड़ित थे,  अब 'मिर्जा' और 'मियां लादेन' के किस्से सुनाकर हमें कौन गुदगुदाएगा, कौन हमारा दिन मस्त बनाएगा।



केपी सक्सेना से मैं कभी नहीं मिला मगर उनसे मेरा आत्मीय रिश्ता था। हर बुधवार को उनका लेख 'हिंदुस्तान' अख़बार में छपता था। इलाहाबाद में पोस्टिंग के दौरान बुधवार को ही मेरा वीकली ऑफ होता था और मैं दिन की शुरुआत उनका व्यंग्य पढ़कर शुरू करता था। मित्र शिवम् भी साथ ही रहते थे। उन्हें जोर-जोर से पढ़कर सुनाता और फिर हम दोनों खूब ठहाके लगाते थे। पूरे दिन के कष्ट दूर हो जाते थे और माहौल मस्त हो जाता था। उनके व्यंग्य की तासीर पूरे हफ्ते तक बनी रहती थी।    



ढाई-पौने तीन सालों का सिलसिला इलाहाबाद छूटने के साथ ही छूट गया और अब ऐसी नियति हो गई कि कभी-भी नहीं पढ़ पाऊंगा। मैं दुख़ी नहीं हूं क्योंकि उन्होंने हर हाल में खुश रहने की सीख दी है। केपी सक्सेना हिन्दी, उर्दू और अवधी पर समान पकड़ रखते थे। 'मियां लादेन' के जरिए अपने व्यंग्य में वह गली के नुक्कड़ पर हो रही बातों को अख़बार में छपी एक खबर के जरिये देश की समस्याओं से जोड़कर नेताओं पर करारा व्यंग्य करते थे।


 

2000 में पद्मश्री से सम्मानित  
दूरदर्शन पर 80 के दशक में आने वाले पहले सोप ओपेरा 'बीवी नातियों वाली' लिखी।
'जोधा अकबर' के लिए उन्हें  बेस्ट डायलॉग कटेगरी में फ़िल्म फेयर के लिए नामांकित किया गया
रेलवे में बतौर स्टेशन मास्टर नौकरी भी की
बरेली में जन्मे केपी लखनऊ में बस गये थे
केपी सक्सेना: 1932-2013 

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