पोस्टर फाड़


शाहिद कपूर फिल्म इंडस्ट्री में पुराने हो चुके हैं, मगर अभी भी अपनी जगह बनाने के लिए संघर्षशील हैं। ऐसे में राजकुमार संतोषी की फिल्म 'फटा पोस्टर निकला हीरो' उनकी राह आसान बना सकती है. फिल्म में उन्होंने 'मौसम' से तो बेहतर काम किया है। अच्छे दिखे है, अच्छा लगे हैं। डांस के तो वो महारथी हैं ही मार-धाड़ में भी खूब रंग जमाया है।

फिल्म से आप बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं कर सकते हैं क्योंकि इसमें जो कुछ भी दिखाया गया है वो आपने कई फिल्मों में देखा सुना होगा। मगर एक बात जरूर हैं 'ग्रैंड मस्ती' देखने की बजाय यह फिल्म बेहतर विकल्प हो सकती है।

फिल्म की कहानी एक गांव से शुरू होती है और मायानगरी में आकार ख़त्म। विश्वास राव यानी की शाहिद का बचपन से एक सपना होता है कि वो बड़ा होकर हीरो बने। वहीं उनकी मां बनीं पद्मिनी कोल्हापुरे उसे एक ईमानदार पुलिस अफसर बनाना चाहती हैं क्योंकि उनके पति बने मुकेश तिवारी बेईमान अफसर थे।



मां विश्वास को पुलिस में भर्ती होने के मुंबई भेजती हैं, मगर यहां आने पर विश्वास को फ़िल्मी कीड़ा और जोर से काट लेता है। कुछ नाटकीय घटनाक्रम के बाद विश्वास की फोटो अख़बार में छ्प जाती है और मां यह देख शहर बेटे से मिलने चली आती है। फिर वही होता है जो आप मुन्नाभाई एमबीबीएस में देख चुके हैं। 

आप सोच रहे होंगे विलेन की एंट्री नहीं हुई। तो बता देता हूं। विलेन का मामला ये है कि जिस समय विश्वास नकली पुलिसवाला बन मुंबई की गलियों में फिर रहे होते हैं उसी बीच उनकी टक्कर काजल जिनकी भूमिका इलियाना डी क्रूज़ ने निभाई है, से होती है। फिल्म में उन्हें कम्प्लेंट काजल कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि जहां कहीं भी अपराध होता है वह शिकायत करने थाने पहुंच जाती हैं। बाद में ये शिकायतें सिर्फ विश्वास के पास आती हैं। ऐसे में नकली पुलिस बने विश्वास को असली अपराधियों से पंगा लेना पड़ता है। नकली पुलिस और असली चोर की भाग-दौड़ में दोनों को प्यार हो जाता है।


खैर, विश्वास का यह भेद मां के सामने खुल जाता है। मां की नाराजगी से हीरो बनने का भूत उन पर से उतर जाता है। इसके बाद विलेन से मार-धाड़ और फिर हैप्पी एंडिंग। फिल्म में मार-धाड़ को बेहतर तरीके से फिल्माया गया है। फिल्म कई जगहों पर खूब गुदगुदाती भी है। 'अगल-बगल', 'धतिंग नाच' और 'तू रंग शरबतों का' गाने आज के हिसाब से कर्णप्रिय बन पड़े हैं और शाहिद का उम्दा डांस इसमें चार चांद लगा देता है।

इलियाना के पास रोल के नाम पर कुछ खास नहीं था, मगर उनमें संभावनाएं हैं। जैसा कि उन्होंने 'बर्फी' में साबित भी किया है। विलेन के रोल में सौरभ शुक्ला ने खूब गुदगुदाया है और स्ट्रगलिंग डायेक्टर बने संजय मिश्र अपने देसी अंदाज़ में कॉमेडी में जबरदस्त तड़का लगाया है।


तो फिर मिलते हैं..
कुछ और बातों के साथ
तब तक..
रहौ लल्लनटाप
और
कहौ लल्लनटाप...


टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

असली मस्तराम की तलाश

हैप्पी फीट: मछली की तरह तैरने वाला पक्षी पेंग्विन