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...और हाथ मलते रह गया इंस्पेक्टर अमरीश पुरी

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आंखें खुली हों तो आप वही देखते हो जो देखना चाहते हो, लेकिन बंद आंखें तो न जाने क्या-क्या दिखाती हैं। अब मुझे नहीं लगता कि मैं किसी को गोली मार सकता हूं, लेकिन मैंने एक इंस्पेक्टर पर कई गोलियां चलाईं। नतीजा ये हुआ कि खूंखार इंस्पेक्टर अमरीश पुरी हाथ में पिस्तौल लिए पूरे शहर में मुझे ढूंढता फिर रहा था। मेरे हाथ में पिस्तौल कहां से आई। पुलिसवाले को गोली क्यों मारी और मैं किस शहर में था, इस बारे में मुझे कुछ याद नहीं। मगर मैं बुरी तरह से डरा हुआ था और कानून के लंबे हाथों से बचने की पूरी कोशिश कर रहा था। सारा दिमाग इसी बात पर लगा रहा था कि किसी तरह से इंस्पेक्टर अमरीश पुरी से पीछा छुड़ा लूं। भागने का एक ही रास्ता सूझ रहा था कि किसी तरह से नेपाल भाग जाऊं, तो पुलिस मेरा कुछ उखाड़ नहीं पाएगी। उसके लिए अपने शहर गोरखपुर जाना जरूरी था, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो सका। इधर-उधर भागते-भागते मुझे भयंकर प्यास लग गई थी और प्यास के मारे मेरी जमी जमाई नींद उखड़ गई। घड़ी देखी सुबह के सात बज रहे थे, मगर ये उठने का वक्त नहीं था, क्योंकि अभी आधी नींद ही हो सकी थी। फिर भी बिस्तर से उठा पानी पीने की खातिर। पानी ...